महाराष्ट्र और झारखंड में चुनावी सरगर्मी चरम पर है। "हमने ये किया, वो करेंगे" जैसे वादों की गूंज हर नुक्कड़ और गली में सुनाई दे रही है। नेता जनता को विकास के पुराने किस्से और भविष्य के सुनहरे सपने सुनाकर लुभाने में जुटे हैं।
इस चुनावी मौसम में मतदाता भी कम व्यस्त नहीं हैं। कोई अपने घर की दीवार पर पोस्टर लगवा रहा है, तो कोई विरोधी पार्टी के झंडे हटाने में लगा है। कुछ लोग चुनावी रैलियों में भाषण सुनने के बजाय रैली के खाने की समीक्षा कर रहे हैं। "समोसे बढ़िया थे, लेकिन चाय फीकी थी," एक युवा मतदाता ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा।
सोशल मीडिया पर हर पार्टी के समर्थक अपनी-अपनी "सच्चाई" साबित करने में लगे हैं। वहीं, साइलेंट वोटर चुपचाप इस बार की बिसात समझने में जुटे हैं।
नेताओं के वादे 5G स्पीड से जनता तक पहुंचाए जा रहे हैं, लेकिन जनता अब QR कोड स्कैन कर सच-झूठ की पड़ताल करना चाहती है। महाराष्ट्र में जहां "विकास की गाड़ी" का मुद्दा गरम है, वहीं झारखंड में "जंगल और जमीन" पर चर्चा तेज है।
अब देखना यह है कि वादों और नारों के इस महासंग्राम में किसकी किस्मत का सूरज चमकता है और किसके वादे अगले चुनाव तक फिर से "Pending" रह जाते हैं।
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