बिहार सरकार ने गुरूजी की नेतागिरी को लेकर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अब, जो शिक्षक अपनी शिक्षा के अलावा राजनीति में घुसपैठ करने की कोशिश करेंगे, उन्हें "कड़ी सजा" मिलने वाली है। ये सजा एक अल्टीमेटम से शुरू होगी, फिर ब्लॉक में तबादला और अंत में जिले से बाहर भेजे जाने तक हो सकती है।
अब गुरुजी का काम पढ़ाना है ना की किसी पार्टी का झण्डा उठा के राजनीति करना। हालांकि सभी तो नहीं पर ऐसे बहुत सारे गुरुजी किसी ना किसी पार्टी के प्रचार अभियान तक का हिस्सा बन जाते हैं और यह एक शिक्षक को शोभा भी नहीं देता। उनके अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचार हो सकते हैं पर उसका प्रभाव उनके शैक्षिक कार्यों पर ना पड़ें।
यह कदम बिहार सरकार का शिक्षा क्षेत्र में अनुशासन बनाए रखने और राजनीति को शिक्षण कार्य से अलग रखने के लिए है।
नई नियमावली के तहत स्थानीय राजनीति में शामिल रहने वाले शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। ऐसे शिक्षकों को पहले तीन दिन का अल्टीमेटम दिया जाएगा, और जवाब संतोषजनक न होने पर डीएम के स्तर से उनका स्थानांतरण दूसरे ब्लॉक में किया जा सकेगा। जरूरत पड़ने पर उन्हें जिले से बाहर भी ट्रांसफर किया जा सकता है। अगर शिक्षक को कार्रवाई अनुचित लगती है, तो वह शिक्षा विभाग के निदेशक या विभागीय सचिव के पास अपील कर सकता है। यह फैसला शिक्षकों की जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए उठाया गया है।
नेतागिरी करने वाले गुरूजी की खैर नहीं
बिहार सरकार ने गुरूजी की नेतागिरी को लेकर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अब, जो शिक्षक अपनी शिक्षा के अलावा राजनीति में घुसपैठ करने की कोशिश करेंगे, उन्हें "कड़ी सजा" मिलने वाली है। ये...



