चुनावी-चोंचले

धक्कामार सियासत: संसद में बहस नहीं, अब 'धक्का-मुक्की' का दौर

संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, अब "धक्कामार सियासत" का अखाड़ा बन चुका है। गुरुवार को संसद के मकर द्वार पर जो नजारा दिखा, वह किसी कुश्ती प्रतियोगिता से कम नहीं था। बाबा स...

धक्कामार सियासत: संसद में बहस नहीं, अब 'धक्का-मुक्की' का दौर

संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, अब "धक्कामार सियासत" का अखाड़ा बन चुका है। गुरुवार को संसद के मकर द्वार पर जो नजारा दिखा, वह किसी कुश्ती प्रतियोगिता से कम नहीं था। बाबा साहेब आंबेडकर की तस्वीरों वाले पोस्टर, जोरदार नारेबाजी और उसके बाद ‘धक्का-मुक्की’ की लाइव परफॉर्मेंस ने लोकतंत्र को एक नया एंटरटेनमेंट जॉनर दे दिया है।

राहुल गांधी पर आरोप है कि उन्होंने बीजेपी सांसदों को इस अंदाज में धक्का दिया कि वे सीधे ICU में जा पहुंचे। उधर, कांग्रेस का कहना है कि यह सब अमित शाह को बचाने की 'महागठबंधन विरोधी साजिश' है। संसद की सीढ़ियां अब बहस के लिए नहीं, बल्कि धक्का देने और गिराने के लिए इस्तेमाल हो रही हैं।

सांसद ICU में हैं, पर राजनीति पूरी तरह फिट और तंदरुस्त नजर आ रही है। एक ओर प्रताप सारंगी सिर पर टांके लगवाकर लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रियंका गांधी इसे "साजिश" करार देकर नैरेटिव को चमका रही हैं। ऐसा लगता है कि संसद अब विचार-विमर्श के बजाय "धक्कामुक्की ओलंपिक्स" की मेजबानी करने के लिए तैयार है।

सोशल मीडिया पर भी घमासान जारी है। X पर वीडियो डिलीट करने की बहस ने ये साबित कर दिया कि अब संसद के हंगामे से ज्यादा दिलचस्पी डिजिटल 'धक्का' में है। किसी ने सही कहा है, "लोकतंत्र में विचार गिरते नहीं, बल्कि सांसद गिरा दिए जाते हैं।"

अब सवाल यह है कि संसद की अगली कार्यवाही 'मूल्य आधारित राजनीति' पर होगी या 'धक्का-मुक्की में खेल भावना' पर? जवाब चाहे जो भी हो, जनता को मनोरंजन भरपूर मिल रहा है। आखिरकार, यह हमारा महान लोकतंत्र है—जहां बहस हो या धक्का, हर चीज़ का मजा लोकतांत्रिक ही होता है।