देश में ट्रेनों की भीड़ और टिकटों की महंगाई ने एक बार फिर क्रिएटिविटी की नई मिसाल पेश की है। जब तक हम "जनरल क्लास" और "स्लीपर क्लास" की चर्चा कर रहे थे, एक युवक ने "बेसमेंट क्लास" का आविष्कार कर लिया। टिकट के पैसे न होने पर, इस जांबाज ने सीधे ट्रेन के पहियों के पास अपना स्थान सुरक्षित किया और इटारसी से जबलपुर तक 250 किलोमीटर का "एडवेंचर ट्रिप" पूरा किया।
रेलवे के कर्मियों ने जब युवक को पहियों के पास छिपा पाया तो पहली प्रतिक्रिया यही थी, "भाईसाहब, आरएसी भी नहीं मिली थी क्या?" युवक ने जवाब दिया, "पैसे होते तो जनरल डिब्बे में लटकता, लेकिन मजबूरी ने पहियों का सहारा दिला दिया।"
सोचिए, यह वही रेलवे है जो ‘वेटिंग लिस्ट’ और ‘कन्फर्म टिकट’ का गणित समझने में लोगों को सालों तक उलझाए रखता है।
रेल कर्मियों की चिंता जायज थी—पहिए के पास छिपे इस नए यात्री को देखकर उन्हें भी समझ नहीं आया कि इसे "असामान्य यात्री" माने या "खतरों के खिलाड़ी" का नया सीजन। तुरंत वायरलेस से सूचना दी गई, और ट्रेन रोकी गई। शायद यह पहला मौका था जब किसी ने पहिए के नीचे बैठकर "ऑनटाइम" यात्रा का आनंद लिया हो।
युवक के इस कारनामे पर सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कुछ लोगों ने इसे "आर्थिक मजबूरी का प्रतीक" कहा, तो कुछ ने सलाह दी कि रेलवे को अब पहियों के पास सीट नंबर देना शुरू कर देना चाहिए। नाम भी सुझाया गया—"अंडर-कोच क्लास।"
रेलवे अधिकारियों का बयान भी कम मजेदार नहीं था। "हमने टिकट चेकिंग के कई मामले देखे हैं, लेकिन यह पहली बार है जब टिकट की जरूरत पहिए के पास तक पहुंच गई है।"
युवक को आखिरकार बाहर निकाल लिया गया, लेकिन जाते-जाते वह रेलवे प्रशासन को एक नसीहत दे गया: "डिब्बों की भीड़ कम कीजिए, वरना अगली बार पूरी ट्रेन के नीचे ही यात्रा के लिए भीड़ लग जाएगी।"
ऐसा लगता है कि रेलवे में नई "डिस्कवरी चैनल" जैसी यात्रा की संभावनाएं खुल गई हैं। आखिरकार, भारत में यात्री न सिर्फ साधन खोजते हैं, बल्कि सफर को रोमांचक बनाने का हुनर भी जानते हैं!



