दिल्ली के चुनाव का बिगुल बजते ही, नेता जी नए-नए वादों के पिटारे लेकर जनता के बीच उतरते हैं। जैसे ही चुनावी रैली शुरू होती है, सड़कें अचानक इतनी चमकने लगती हैं कि लगता है, दिल्ली मेट्रो को भी शर्म आ जाए।
नेता जी कहते हैं, "अगर हमारी सरकार बनी, तो हर गली में फ्री वाई-फाई मिलेगा, और हर नुक्कड़ पर फ्री चाय-कॉफी की मशीन!" जनता तालियां बजाती है, लेकिन सोचती है कि बिजली का बिल कौन भरेगा? तब तक कोई बिजली बिल भी फ्री करने का वादा कर जाता है।
दूसरे दल के नेता वादा करते हैं, "हम दिल्ली को लंदन बना देंगे!" लेकिन अगले ही दिन सड़कों पर पानी इतना भर जाता है कि दिल्ली के लोग चोटी नाव खरीदने की सोचने लगते हैं।
फिर तीसरे नेता जी का नारा आता है, "हम हवा को शुद्ध कर देंगे!" जैसे ही भाषण खत्म होता है, मास्क पहने जनता सोचती है, "साहब, पहले ये भाषण शुद्ध कर लो।"
जनता भी मज़े में है। कोई कहता है, "सरकार किसी की भी बने, हमें तो बस छुट्टी चाहिए!"
दिल्ली का चुनाव एक ऐसा उत्सव है, जहां वादों की बरसात होती है और ज़मीन पर हकीकत की धूल उड़ती है। चुनाव खत्म होते ही जनता फिर से वही पुराने सवालों के जवाब ढूंढने लगती है।
आखिर में, चुनावी रंगमंच का पर्दा गिरता है, और अगले पांच सालों का इंतज़ार शुरू। दिल्ली में यही खेल चलता रहता है—वादों की गूंज और उम्मीदों की धुन।



