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गूगल बाबा पर भरोसा, हो जाएगा लोचा

आज के दौर में जहां गूगल मैप्स लोगों को रास्ता दिखाने का काम करता है, वहीं बरेली की इस घटना ने यह साबित कर दिया कि गूगल पर भरोसा, हो जाएगा लोचा! आप सोच रहे होंगे, ये कैसे? तो जनाब,...

गूगल बाबा पर भरोसा, हो जाएगा लोचा

आज के दौर में जहां गूगल मैप्स लोगों को रास्ता दिखाने का काम करता है, वहीं बरेली की इस घटना ने यह साबित कर दिया कि गूगल पर भरोसा, हो जाएगा लोचा! आप सोच रहे होंगे, ये कैसे? तो जनाब, गूगल ने कार सवारों को एक अधूरे पुल का रास्ता दिखा दिया, और फिर, क्या ही कहना—पुल अधूरा था, पर जिंदगी पूरी हो गई।

अब ये तो मानना पड़ेगा कि गूगल बाबा का आत्मविश्वास गजब का है। जब उसने अधूरे पुल का रास्ता दिखाया, तो शायद उसने सोचा होगा, "पुल अधूरा है तो क्या, आपके इरादे तो पूरे हैं। उड़कर पार कर लीजिए!" और प्रशासन? उनका भी मानना था कि संकेतक और बैरिकेड्स लगाना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं, क्योंकि गूगल है न!

अब बात करते हैं स्थानीय प्रशासन की। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई। यानी "कुछ न करना"। अधूरे पुल पर न कोई चेतावनी बोर्ड, न बैरिकेड्स। शायद उन्होंने सोचा, "हम क्यों मेहनत करें? गूगल मैप्स है न।" और गूगल ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई—बस, परिणाम थोड़े घातक हो गए।

दरअसल, रामगंगा नदी का रुख बदलने से बरेली को बदायूं से कनेक्ट करने के लिए फरीदपुर के खल्लपुर गांव के पास बनाए गए पुल की एप्रोच रोड पिछले साल जुलाई मैं कट गई थी। जिससे गांव और पुल के बीचों बीच नदी बहने लगी और दूसरी तरफ से पुल का एक हिस्सा सीधे नदी की ओर खुल हुआ है। हादसा उस समय हुआ जब कार में सवार लोग गूगल मैप की सहायता से अपना गंतव्य तलाश रहे थे। मैप ने उन्हें एक ऐसे पुल की ओर मोड़ दिया, जो निर्माणाधीन था और पूरी तरह से एक सिरा खुला हुआ था। रात का समय होने की वजह से अंधेरा था, और आसपास कोई चेतावनी बोर्ड या सुरक्षा के लिए बैरिकेड्स नहीं लगाए गए थे। कार चालक को अधूरे पुल का अंदाजा नहीं हुआ, और कार सीधे पुल से नीचे गिर गई और तीन लोगों की जान चली गई। यह घटना यात्रियों और उनके परिवारों के लिए गहरा आघात बन गई।

यात्रियों को भी यह समझना चाहिए कि गूगल मैप्स सबकुछ नहीं जानता। ये सॉफ्टवेयर है, भाई, भविष्यवक्ता नहीं। लेकिन नहीं, हम तो पूरा भरोसा करेंगे। गूगल ने बोला, "लेफ्ट लो," तो ले लिया। गूगल ने बोला, "पुल क्रॉस करो," तो सोच भी लिया कि पुल तो होगा ही। अब पुल अधूरा निकला तो इसमें गूगल की क्या गलती?

यह घटना हमें यह समझाने के लिए काफी है कि तकनीक कितनी भी उन्नत हो, इसे आंख मूंदकर फॉलो करना आपकी गलती हो सकती है। गूगल बाबा को हर जगह 'भगवान' मत मानिए। और प्रशासन? उनके लिए यह घटना एक सबक है।

तो अगली बार जब गूगल मैप्स बोले, "आपकी मंज़िल आ गई," तो पहले चार बार देख लें कि मंज़िल है भी या कोई अधूरा पुल आपका इंतजार कर रहा है।