पहले राजनीति में बड़े-बड़े नेता अपनी रणनीतियाँ बनाने के लिए प्रशांत किशोर की ओर देखते थे, मानो उनके पास राजनीति का ‘गोल्डन फॉर्मूला’ हो। लेकिन अब वही प्रशांत किशोर खुद राजनीति के उलझे जाल में फंसे हुए हैं। जहाँ एक वक्त में दूसरों की चुनावी रणनीतियों में जान डालने का काम किया, वहीं अब खुद अपनी पार्टी और आंदोलन की रणनीति को सम्हालते हुए भी ढीले पड़ते दिख रहे हैं।
कहाँ चुनावी समर में विजय के तीर चलाने वाले 'पीके', और कहाँ अब अपने ही राजनीतिक भविष्य की राह खोते हुए नजर आ रहे हैं! राजनीति के चक्कर में, पहले से कहीं ज्यादा उलझ गए हैं। कहीं नेता पार्टी छोड़ने में लग रहे हैं, तो कहीं छात्र आंदोलनों में अपनी छवि बिगाड़ते दिख रहे हैं। अब यह सवाल उठता है कि क्या राजनीति के इस खेल में वो वही मास्टरमाइंड हैं या सिर्फ एक और चालाक मोहरे की तरह फंस चुके हैं?
बिहार की राजनीति में अब प्रशांत किशोर का हाल ऐसा हो गया है, जैसे रामायण के काकभुशुंडि का। कथा सुनाते-सुनाते जब यश की उम्मीद थी, तो वो अपयश के शिकार हो गए। राजनीति में कदम रखते ही पीके के सारे प्रयास उलटे पड़ते जा रहे हैं। बिहार में हजारों किलोमीटर पैदल यात्रा करके जनसुराज पार्टी बनाई, लेकिन अब वही पार्टी उपचुनावों में धूल खाती नजर आ रही है। पार्टी जॉइन करने वाले नेता अब एक-एक कर उसे छोड़ रहे हैं, जिससे पीके का राजनीतिक भविष्य डगमगाने लगा है।
फिर जब पीके ने बीपीएससी परीक्षा रद्द कराने की मांग करने वाले छात्रों का समर्थन किया, तो नायक बनने का सपना टूटते हुए देखा। लाठीचार्ज के बाद वे हीरो से विलेन बन गए। पहले छात्रों के बीच एक छवि बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अब विपक्षी दलों का निशाना बने हुए हैं। आरोप है कि जब आंदोलन की जरूरत थी, तो पीके चुपके से पलायन कर गए, जिससे उनकी विश्वसनीयता को बड़ा झटका लगा।
अब सवाल यह उठता है कि क्या बिहार की राजनीति में पीके अब भी फिट हैं? क्या वे युवाओं में अपनी पैठ बनाने में नाकाम हो गए हैं? या फिर विपक्षी दल उन्हें खलनायक बना कर अपनी राजनीति चमकाने का मौका तलाश रहे हैं?



