हर साल मानसून आते ही हमारे देश में एक ही कम्युनिटी की बल्ले-बल्ले होती थी—'डेंगू वाले मच्छर'। इंसानी शरीर पर मुफ़्त का कब्ज़ा जमाकर, ब्लड प्लेटलेट्स का डिस्काउंट ऑफर चलाने वाले इन उड़ते हुए नवाबों को अब बड़ा झटका लगने वाला है। औषधि महानियंत्रक (DCGI) ने जापानी कंपनी टाकेडा की डेंगू वैक्सीन 'क्यूडेंगा' (QDENGA) को भारत में एंट्री दे दी है।
अब तक डेंगू के मौसम में इंसान सिर्फ ऑल-आउट, कॉइल और ओडोमोस के भरोसे युद्ध लड़ता था, जिसमें असली जीत हमेशा मच्छर की ही होती थी। पर अब 4 से 60 साल तक के भारतीयों की 'इम्युनिटी' का सॉफ्टवेयर अपडेट होने जा रहा है!
'क्यूडेंगा' के आने से बदलेगा खेल:
- सबको समान अवसर (Equal Opportunity): आपको पहले कभी डेंगू हुआ हो या आप मच्छरों के लिए बिल्कुल 'ताज़ा शिकार' हों-यह वैक्सीन सबको बराबर सुरक्षा देगी। मच्छरों की वो पुरानी रणनीति कि "पुराने मरीज को ढूंढकर फिर से काटो ताकि ज्यादा असर हो", अब पूरी तरह फ्लॉप हो जाएगी!
- तीन महीने की मोहलत: वैक्सीन की दो ख़ुराकों (Doses) के बीच 3 महीने का गैप रखा गया है। यह 3 महीने इंसानों के लिए 'रीचार्ज टाइम' होंगे, ताकि दूसरी डोज़ के बाद वे मच्छरों के सामने किसी 'सुपरहीरो' की तरह खड़े हो सकें।
- हॉस्पिटल इंडस्ट्री को करारा जवाब: अब गंभीर संक्रमण और अस्पताल में भर्ती होने का खतरा काफी कम हो जाएगा। यानी जो प्लेटलेट्स गिरते ही अस्पताल वाले आईसीयू (ICU) का कमरा बुक कर लेते थे, अब मरीज आराम से घर पर ही नारियल पानी पीकर मच्छरों की नाकामी का जश्न मना सकेगा!
लेकिन... आलस का राष्ट्रीय धर्म निभाना अभी भी ज़रूरी!
विशेषज्ञों ने साफ कर दिया है कि भले ही आपके शरीर में जापानी टेक्नोलॉजी वाली वैक्सीन आ जाए, लेकिन कूलर का पानी ना बदलने और गमलों में पानी जमा रहने देने की हमारी 'सांस्कृतिक परंपरा' पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।
आखिरकार, मच्छरों को पनपने का मौका देना हमारी दरियादिली है, और वैक्सीन लगवाकर उनकी काटी हुई बीमारी को चुटकियों में हरा देना हमारी नई ताकत!
संक्षेप में कहें तो, 'क्यूडेंगा' के आने से इंसानों का पलड़ा भारी हो गया है। अब जब भी कोई मच्छर आपको काटने आएगा, तो वो बीमारी फैलाने नहीं, बल्कि अपनी किस्मत आजमाने आएगा, क्योंकि अब सामने खड़ा इंसान 'वैक्सीनेटेड' है!
