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'पाप तुम्हारा, बिल हमारा?': जब बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप को थमाया 'कार्बन का रसीद कटेगा' कार्ड!

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में इन दिनों माहौल थोड़ा गर्म है, और इसकी वजह कोई हीटर नहीं, बल्कि हमारे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का दिया हुआ 'ऑर्गनिक कड़वा सच' है! यूरोप के ब...

'पाप तुम्हारा, बिल हमारा?': जब बर्लिन में पीयूष गोयल ने यूरोप को थमाया 'कार्बन का रसीद कटेगा' कार्ड!

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में इन दिनों माहौल थोड़ा गर्म है, और इसकी वजह कोई हीटर नहीं, बल्कि हमारे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का दिया हुआ 'ऑर्गनिक कड़वा सच' है! यूरोप के बड़े-बड़े विकसित देश, जो सालों से दुनिया को 'पर्यावरण संरक्षण' का ज्ञान बांटते आ रहे हैं, उन्हें जब गोयल साहब ने दर्पण दिखाया, तो यूरोपीय साहिबों की ग्रीन-टी हलक में ही अटक गई।

सीधा गणित यह था:“भैया, रायता तुमने फैलाया, औद्योगिकीकरण के नाम पर कोयला तुमने फूंका, ओजोन छेद तुमने किया... और अब जब बिल भरने की बारी आई, तो भारत की तरफ देखकर कह रहे हो कि 'चलो कॉन्ट्रीब्यूट करो!' यह कहाँ का न्याय है?”

'17% जनता, 3% धुआँ' बनाम '4% जनता, पूरा ड्रामा!'

गोयल साहब ने बर्लिन के मंच से आंकड़े फेंके नहीं, बल्कि सीधे दाग दिए! उन्होंने समझाया कि भारत में दुनिया की 17% आबादी रहती है, लेकिन हमारा कार्बन उत्सर्जन 3% से भी कम है। वहीं दूसरी तरफ, यूरोप वाले हैं - आबादी कुल 3 से 4 फीसदी, लेकिन नखरे और ज्ञान 100%!

यूरोप वालों का हाल तो उस अमीर पड़ोसी जैसा है जो रात भर डीजे बजाकर पूरे मोहल्ले की नींद हराम करे और सुबह उठकर सबसे गरीब पड़ोसी से कहे - "तुम्हारे घर के चूल्हे से धुआँ निकल रहा है, इससे पर्यावरण खराब हो रहा है, तुरंत जुर्माना भरो!"

100 अरब डॉलर का 'पेरिस वाला प्रॉमिस' और यूरोप का 'भूलने की बीमारी'

वर्ष 2015 के पेरिस क्लाइमेट सम्मेलन में विकसित देशों ने छाती ठोककर वादा किया था - "हम हर साल 100 अरब डॉलर देंगे ताकि विकासशील देश हरी-भरी तकनीक अपना सकें!"

अब 2026 चल रहा है, लेकिन उस 100 अरब डॉलर का पता वैसे ही गायब है जैसे गर्मियों में कूलर का पानी! यूरोप वाले इस वादे पर ऐसे चुप बैठ जाते हैं मानो किसी ने उनके मुँह में कार्बन टैक्स का अंगूठा ठूँस दिया हो। पीयूष गोयल ने साफ़ शब्दों में याद दिलाया:"अरे जनाब! वादे किए थे तो निभाओ, सिर्फ ज्ञान बाँटने से ग्लेशियर पिघलना बंद नहीं होंगे!"

CBAM टैक्स: 'हमारा लोहा, तुम्हारा रोना!'

यूरोप वालों ने एक नया पैंतरा निकाला है - CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म)। नाम इतना लंबा है कि बोलते-बोलते ही कार्बन उत्सर्जन हो जाए! आसान भाषा में यह भारत के स्टील और सामान पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की एक 'फैशनेबल गुल्लक' योजना है।

गोयल साहब ने सीधे-सीधे कह दिया कि 140 करोड़ लोगों का पेट भरना और उनका विकास करना हमारी प्राथमिकता है। हम तुम्हारे इस 'स्मार्ट टैक्स' वाले जाल में फँसकर अपने देश का विकास नहीं रोकेंगे।

सार बात: 'पहले अपना धुआँ संभालो साहब!'

संक्षेप में कहें तो, बर्लिन की इस बैठक में भारत ने यूरोप को यह साफ़ संदेश दे दिया है कि:

"अगर सदियों तक तुमने फ़ैक्ट्रियाँ चलाकर धरती को ओवन बनाया है, तो उसकी एयर-कंडीशनिंग का खर्च भी तुम्हीं को उठाना पड़ेगा! हम अपने 140 करोड़ लोगों का चूल्हा बंद करके तुम्हारी कार्बन-न्यूट्रल पार्टी का कैटरिंग बिल नहीं भरेंगे!"

अब देखना यह है कि यूरोप अपने 100 अरब डॉलर का बटुआ खोलता है या फिर अगली मीटिंग में कोई नया 'ग्रीन-टैक्स' नाम का शगूफा लेकर आता है!

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