अर्जेंटीना के फैंस ने सोच रखा था कि 2026 का यह फाइनल लियोनेल मेसी की विदाई का एक ऐसा भव्य ड्रामा होगा जहाँ बैकग्राउंड में भावुक संगीत बजेगा और मेसी ट्रॉफी उठाकर मुस्कुराएंगे। लेकिन स्पेन के युवाओं ने शायद स्क्रिप्ट नहीं पढ़ी थी! उन्होंने पूरे 90 मिनट तक अर्जेंटीना को गेंद छूने के लिए ऐसे तरसाया, जैसे कोई कंजूस अपनी तिजोरी की चाबी के लिए तरसाता है।
मार्टिनेज की दीवार बनाम स्पेन की तपस्या पूरे मैच में ऐसा लग रहा था कि स्पेनिश खिलाड़ी केवल फुटबॉल नहीं खेल रहे थे, बल्कि मैदान पर 'गेंद पर कब्ज़ा कैसे रखें' की पीएचडी थीसिस जमा कर रहे थे। अर्जेंटीना के गोलकीपर एमिलियानो मार्टिनेज ने गोलपोस्ट के सामने ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी कर दी थी कि मानो वो गोल नहीं, देश की सीमा की रक्षा कर रहे हों। 90 मिनट तक उन्होंने स्पेन के हर हमले को ऐसे नाकाम किया, जैसे कोई अनुभवी सरकारी बाबू किसी फाइल को पास होने से रोकता है।
106वें मिनट का वो 'सरप्राइज' ट्विस्ट जब सबको लगा कि मैच अब पेनल्टी शूटआउट के रोमांचक (और दिल का दौरा पड़ने वाले) मोड़ पर जाएगा, तभी 106वें मिनट में फेरान टोरेस बेंच से उठे और उन्होंने कहा, "रुको, मुझे घर जाने की जल्दी है।" निको विलियम्स के पास को उन्होंने इतनी खूबसूरती से गोल में बदला कि अर्जेंटीना की मजबूत डिफेंस बस यही सोचती रह गई कि 'गेंद आई किधर से थी?'
मेसी की विदाई और फुटबॉल का 'बैटन पास' दूसरी तरफ, अर्जेंटीना की टीम ने पूरे 90 मिनट तक गोलपोस्ट पर एक भी ढंग का शॉट न मारकर यह साबित करने की कोशिश की कि वे 'अहिंसा के मार्ग' पर चल रहे हैं। रही-सही कसर एंजो फर्नांडीज ने रेड कार्ड खाकर पूरी कर दी, मानो उन्होंने सोचा हो कि 11 खिलाड़ियों के साथ जीतना तो बहुत आसान है, असली मजा तो 10 लोगों के साथ हारने में है!
मैच के बाद 39 साल के मेसी थोड़े भावुक जरूर दिखे, लेकिन तभी मैदान पर 19 साल के लामिन यामाल उनसे मिले। यह दृश्य ऐसा था जैसे परिवार का कोई बुजुर्ग अपनी वसीयत और घर की चाबियां हंसते-हंसते अपने पोते को सौंप रहा हो।
बधाई हो स्पेन! लुइस डे ला फुएंते की सेना ने 2010 की यादें ताजा कर दीं और दुनिया को बता दिया कि फुटबॉल में भले ही उम्र का तजुर्बा मायने रखता हो, लेकिन जीत आखिर में उसी की होती है जिसके पास अंत तक गेंद होती है!
